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NCERT Solutions for Class 10 हिंदी क्षितिज गद्य खंड पाठ 16:नौबतखाने में इबादत

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अम्मीरुद्दीन उर्फ़ बिस्मिल्लाह खाँ का जन्म बिहार के डुमराँव के एक संगीत प्रेमी परिवार में हुआ। पांच-छह वर्ष के होने पर वे डुमराँव छोड़कर अपने ननिहाल काशी चले गए। वहाँ उनके मामा और नाना रहते थे, जो कि जाने- माने शहनाई वादक थे। ननिहाल में 14 साल की उम्र से ही बिस्मिल्लाह खाँ ने बालाजी के मंदिर में रियाज करना शुरू कर दिया। उन्होंने वहाँ जाने का ऐसा रास्ता चुना जहाँ उन्हें रसूलन और बतूलन बाई की गीत सुनाई देते है जिससे उन्हें खुशी मिलती। अपने साक्षात्कारों में भी इन्होंने स्वीकार किया कि बचपन में इन लोगों ने संगीत के प्रति प्रेम पैदा करने में भूमिका निभाई है।

बिस्मिल्लाह खाँ ने 80 वर्ष के हो जाने के बावजूद हमेशा पांचों वक्त वाली नमाज में शहनाई के सच्चे सुर को पाने की प्रार्थना में बिताया है। वह अपने बचपन की घटनाओं को याद करते हैं कि कैसे वह छुपकर नाना को शहनाई बजाते हुए सुनते तथा बाद में उनकी मीठी शहनाई को ढूंढने के लिए एक-एक कर शहनाई को फेंकते। काशी के संगीत आयोजन में वे अवश्य भाग लेते, गंगा, काशी और शहनाई उनका जीवन थे। बिस्मिल्लाह खान की शहनाई के धुनों की दुनियां दीवानी हो जाती थी, वे नए गायकों और वादकों में घटती आस्था और रियाज़ों के महत्व के प्रति चिंतित थे। 90 वर्ष की उम्र में 21 अगस्त,2006 को उन्होंने दुनियां से विदा ली। वे भारतरत्न, अनेकों विश्वविद्यालय की मानद उपाधियां, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार तथा पद्म विभूषण जैसे पुरस्कारों से जाने नहीं जाएंगे बल्कि अपने अजय संगीत यात्रा के नायक के रूप में पहचाने जाएंगे।

यतींद्र मिश्र का जन्म 1977 में अयोध्या उत्तर प्रदेश में हुआ उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया। ये आजकल स्वतंत्र लेखन के साथ अर्धवार्षिक सहित पत्रिका का संपादन कर रहे हैं। इनकी प्रमुख कार्यशैली में पुस्तक गिरिजा और काव्य संग्रह में यदा-कदा और ड्योढ़ी पर अलाप जैसे लेखन शामिल हैं। इन्हें भारत भूषण अग्रवाल कविता सम्मान और ऋतुराज पुरस्कार आदि से सम्मानित किया जा चुका है।

 

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